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जीव का स्वाभाविक धर्म ऊपर चढ़ना, उन्नति करना, आगे बढ़ना, विकसित होना है । आत्मिक क्षुधा के कारण ही मनुष्य विभिन्न दिशाओं में अपना विकास करता है। रोटी, कपड़ा, घर और आराम की मोटी व्यवस्थाएँ हो जाने से कोई व्यक्ति मजे में जीवित रह सकता है, पर इतने मात्र में किसी को आत्मसंतोष नहीं हो सकता। जीवन की विभिन्न दिशाओं में उन्नति करने की हर मनुष्य को अभिलाषा होती है और उस आकांक्षा की पूर्ति हुए बिना, आंतरिक शांति उपलब्ध नहीं होती ।
उत्थान की अनेक सीढ़ियाँ हैं, उन पर चढ़ता हुआ जीव आत्मोत्थान तक पहुँचता है। शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक, पारिवारिक दांपत्यिक उन्नति को करता हुआ मनुष्य यश, प्रतिष्ठा, आदर, नेतृत्व एवं सुख सुविधा का अधिकारी बनता है । धार्मिक पारमार्थिक, आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ते हुए सतोगुण एवं दिव्य तत्वों की प्राप्ति होती है । भौतिक और आत्मिक दोनों ही दिशाओं में मनुष्य जब बढ़ता है तभी उसकी उन्नति सर्वांगपूर्ण कही जाती है। सांसारिक योग्यताएँ एवं सामर्थ्य भी होनी चाहिए। समर्थ को ही त्याग कहा जाता है । जो अभावग्रस्त एवं दीन-हीन हैं, वह अपने को त्यागी नहीं कह सकता और न उसे त्याग का आनंद मिल सकता है ।
सांसारिक उन्नतियों की भाँति आत्मिक उन्नतियों की अनेक सीढ़ियाँ हैं। इस मार्ग में भी जैसे-जैसे ऊपर को चढ़ते जाते हैं वैसे ही वैसे अनेक दिव्य संपदाएँ उपलब्ध होती हैं। आत्मिक क्षेत्र की संपदाएँ इतनी अनूठी है कि उनकी तुलना में संसार का बड़े से बड़ा सुख एवं वैभव भी तुच्छ बैठता है। उस उन्नति पथ पर मनुष्य बहुधा अपने बलबूते ऊँचा नहीं चढ़ पाता । माता की सहायता से यह उत्कर्ष पथ की यात्रा सरल होती है। माता की कृपा, सहायता एवं प्रेरणा से साधक का उत्साह बढ़ता जाता है और रास्ते की कठिनाइयों से डरने की बजाय उन्हें परास्त करने का साहस पैदा हो जाता है ।
चढ़ाई का मार्ग कठिन होता है। निश्चय ही उसमें काफी श्रम पड़ता है और बड़े साहस तथा धैर्य से काम लेना होता है । इन कठिनाइयों में अनेक साधक फिसल पड़ते हैं, परंतु माता जिसकी पीठ पर है उसे सफलता की दिशा से दिन-दिन अधिक प्रकाश प्राप्त होता चलता है और लक्ष्य की पूर्ति दूर नहीं रह जाती। वह सांसारिक और आत्मिक दोनों दिशाओं में अग्रसर होता है ।