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आत्मा, परमात्मा का अंश है। मनुष्य ईश्वर का पुत्र है, उसमें वह सब शक्तियाँ और संभावनाएँ मौजूद हैं, जो परमेश्वर में होती है । जब साधक गायत्री उपासना द्वारा अपने आंतरिक मल विक्षेपों को शुद्ध कर लेता है तो उनकी अंतःभूमि में दैवी शक्तियों का स्वयमेव प्रादुर्भाव होता है और अनेक अलौकिक सामर्थ्य उसमें प्रकट होती हैं जो साधारण मनुष्यों में नहीं देखी जातीं ।
इन अलौकिक सामर्थों को पाकर कई अदूरदर्शी साधक, सांसारिक प्रयोजनों में उनका प्रयोग करने लगते हैं। यश, प्रतिष्ठा, पूजा, महिमा पाने के लिए उन दिव्य शक्तियों का वे ऐसा प्रदर्शन करते हैं, जिसमें उन्हें चमत्कारी सिद्ध पुरुष समझा जाता है और सांसारिक कामना वाले मनुष्यों की भीड़ उन्हें घेरे रहती है। उनकी पूजा, प्रतिष्ठा पा कर वे सिद्ध पुरुष अपने तपोबल से दूसरों के प्रारब्ध बदल देते हैं । कुछ तांत्रिक वाममार्गी साधनाओं द्वारा अभिचार, घात, सम्मोहन, पिशाच सिद्ध, यक्षिणी साधना करते तथा अपने चमत्कार प्रकट करते हैं।
यह आत्मिक शक्तियों का दुरुपयोग है। आसुरी शक्तियाँ आरंभमें इन सिद्धियों का प्रलोभन देकर नीचे गिराती है ताकि वह असुरता को छोड़कर देवत्व पक्ष में न जावे। नाना प्रकार के प्रलोभन दिखाकर वे साधक को ललचाती हैं और उसे भोग, ऐश्वर्य, यश तथा सांसारिक उलझनों में अपनी शक्तियों को खर्च करने के लिए आकर्षित करती हैं। यदि साधक उस प्रलोभन में फँस जाता है तो उसकी अत्यंत श्रमपूर्वक उपार्जित की हुई आध्यात्मिक कमाई थोड़े ही दिन में समाप्त हो जाती है और वह छँछ रह जाता है ।
इस खतरे से साधक को गायत्री माता बचाती है। वह उसकी बुद्धि में ऐसी दृढ़ता देती है कि इन ऋद्धि-सिक्रियों के प्रलोभन, आकर्षण और सौंदर्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखता है और उनकी ओर से आँख बंद करके अपने लक्ष्य में तन्मय रहता है। तब वे आत्मिक शक्तियाँ उसके लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में सहायक होकर उसे बहुत शीघ्र पूर्णता तक पहुँचा देती हैं ।