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संसार में जीवन-यापन करने के लिए कुछ वस्तुओं की आवश्यकता होती है । जिन वस्तुओं के बिना हमारा काम नहीं चलता या जिनके न होने से जीवन रक्षा में बाधा पहुँचती है उन्हें संपत्ति या लक्ष्मी कहते हैं । अन्न, वस्त्र, मकान, पुस्तक, दवा आदि की आवश्यकताएँ ऐसी हैं जिनके न होने पर जीवन धारण करने में कठिनाई होती है । इन्हीं सब आवश्यक वस्तुओं को रुपए के रूप में सुरक्षित रख लिया जाता है। रुपए के बदले में यह वस्तुएँ चाहे जब प्राप्त कर ली जाती हैं। यही धन संचय का उद्देश्य है ।
परिश्रम, मानसिक योग्यता, साधन, पूँजी सहयोग और परिस्थिति पर धन का उपार्जन अवलंबित है, इसमें से कुछ बातें तो मनुष्य अपने-अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ से जमा कर सकते हैं पर कुछ ऐसी हैं जो मनुष्य के हाथ में नहीं होतीं। प्रयत्न करने मात्र से उन्हें उपलब्ध नहीं किया जा सकता । कई ऐसे अवसर आते हैं कि बिना प्रयत्न या स्वल्प प्रयत्न से बहुत लाभ होता है और कई बार अत्यंत बुद्धिमत्ता और परिश्रम के साथ दैवी विधान भी छिपा रहता है। धनी को निर्धन और निर्धन को धनी होने की घटनाएँ आए दिन घटित होती रहती हैं। इनमें भी कोई रहस्यमय तथ्य छिपा होता है ।
गायत्री की 'श्रीं' शक्ति लक्ष्मी है। लक्ष्मी के द्वारा ऐश्वर्य, वैभव, संपत्ति और धन प्राप्त होता है। यह धन ईश्वर की अमानत है जिसका उपयोग अपने भोग, अहंकार या संचय में नहीं वरन् मनुष्यता के विकास के लिए है। यदि मनुष्य उसे स्वार्थ के ही लिए दवा बैठता है तो उससे वह संपत्ति छीन ली जाती है। गायत्री के उपासक में यह बुद्धि होती है कि धन का उपयोग किस कार्य में करूँ और वह मुझे क्यों दिया गया है ? यह बुद्धि होने के कारण वह सदुपयोग करके थोड़े धन से भी ऐसा लाभ उठा लेता है, जो बड़े-बड़े करोड़पतियों को भी प्राप्त नहीं होता ।
अमीर वह नहीं है जिसके पास मिल, मोटर, जायदाद तथा तिजूरी भरे नोट हैं, वरन् वह है जो ईमानदारी से कमाता है और उसी से संतुष्ट रहता है। गायत्री उपासकों को कभी पैसे की कमी नहीं पड़ती, उनकी उचित आवश्यकताएँ रुकी नहीं रहतीं, उन्हें अपने थोड़े धन में भी कुबेर के समान संतोष होता है। कई बार गायत्री उपासना से विपुल मात्रा में धन वृद्धि होती देखी गई है, पर साथ ही सदुपयोग बुद्धि भी अवश्य बढ़ती है जिससे उसका धन भी धन्य बन जाता है । गायत्री उपासक भूखा नंगा कहीं भी नहीं देखा गया है।