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जैसे काँटा शरीर के किसी भाग में चुभ जाए या कोई विजातीय विष किसी भाग में प्रवेश कर जाए तो वहाँ तब तक पीड़ा होती रहती है जब तक कि उस हानिकारक तत्व का निष्कासन न हो जाए । मनुष्य के जीवन में नाना प्रकार की व्याधियाँ, यातनाएँ, कठिनाइयाँ एवं पीड़ाएँ हैं, वे किन्हीं कारणों की वजह से हैं। जब तक वे कारण दूर नहीं हो जाते तब तक क्लेशों, चिंताओं और दुःखों से छुटकारा नहीं मिल सकता ।
इन्द्रियों का असंयम, खुदगर्जी, कुटिलता, कटुभाषण, अविश्वास, आलस्य, दुर्व्यसन, कुसंग, दुष्कर्मों में प्रवृत्ति पाप की निंदा से लज्जित होने की निर्लज्जता, ईश्वरीय दंड की उपेक्षा, अनुचित लोभ, मोह, ममता की अति अहंकार की ऐंठ आदि अनेक ऐसी बुराइयाँ हैं जो मनुष्य के मन में घुस बैठती हैं तो मनस्तल को काँटे की तरह नोंचती हैं, उसकी प्रतिक्रिया नाना प्रकार के क्लेश, कलह, दुख-दारिद्रय, दंड आदि के रूप में सम्मुख आती हैं। जहाँ अग्नि रहती है वहाँ गर्मी अवश्य ही होगी, ऐसा नहीं हो सकता कि अग्नि तो रहे पर उसके कारण उष्णता पैदा न हो । इसी प्रकार जहाँ उपर्युक्त बुराइयाँ होंगी वहाँ नाना प्रकार के दुख अवश्य ही रहेंगे। यह हो नहीं सकता कि इन दोष-दुर्गुणों के रहते कोई व्यक्ति सुखी जीवन व्यतीत कर सके ।
जैसे गन्ने के रस से नाना प्रकार की मिठाइयाँ बनती हैं, जैसे कपास से नाना प्रकार के वस्त्र बनते हैं, वैसे ही इन दोष-दुर्गुणों के परिपाक से नाना प्रकार की कठिनाइयाँ सामने आती हैं । बुरा प्रारब्ध भी बुरे कर्मों से, बुरे संस्कारों से बनता है। यदि किसी को सुख-शांति की अभिलाषा है तो वह तभी पूरी हो सकती है जब अपने विचार, स्वभाव, उद्देश्य और कार्यक्रम को सुधार लें । गायत्री साधना से सतोगुण की वृद्धि होने के कारण यह सुधार अपने आप होता है और अनेक प्रकार के दूषण, अनिष्ट, कौए और चमगादड़ों की तरह मन-मंदिर में से निकल निकल कर भागते हैं। अंतरात्मा में वैसे ही शांति स्थापित होती है, जैसे काँटा निकल जाने पर तत्क्षण दर्द बंद होता है ।