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बीमारी और कमजोरी के कारण ही मनुष्यों को नाना प्रकार के काया कष्ट भुगतने पड़ते हैं। अस्वस्थता का मूल कारण आहार-विहार का असंयम है । अनियमित दिनचर्या, अनुपयुक्त खाद्य-पदार्थ, आलस्य, अति परिश्रम, इंद्रियों का असंयम, चिंता, अस्वस्थता तथा मनोविकारों के कारण बीमारियाँ पैदा होती हैं। पैतृक, जन्मजात तथा प्रारब्ध रोगों को छोड़कर शेष बीमारियों से मनुष्य यदि चाहे तो बचा रह सकता है । अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और कर्त्तव्यनिष्ठ रहकर दीर्घजीवन तथा आरोग्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है । जब गरीब लोग अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहकर भी हट्टे-कट्टे रह सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि सुविधाजनक स्थिति वाले निरोगी न रह सकें ।
प्रकृति के नियमों को तोड़कर अप्राकृतिक जीवन क्रम अपनाने से शरीर की जीवनी शक्ति घटती जाती है। कमजोरी, थकान, दुर्बलता और उदासी घेरे रहती है । थोड़ा सा भी दबाव पड़ने पर शरीर बिखर जाता है और किसी न किसी बीमारी से ग्रसित होकर चारपाई को पकड़ लेता है। बीमारी में अपने काया कष्ट के अतिरिक्त अर्थ-हीन चिंता, घर वालों को परेशानी तथा अशोभनीय परिस्थितियों की उत्पत्ति होती है । दूसरों को भी रोग की छूत लगने का अंदेशा रहता है । कमजोर आदमी भी एक प्रकार का बीमार ही है। रोग शैय्या पर भले ही वह न पड़े पर कोई उत्पादन, उत्साहवर्धक पुरुषार्थ उन्नति या कमाई का आयोजन उनके द्वारा नहीं हो सकता ।
इस विपन्न दशा से मनुष्य सहज ही बच सकता है, यदि यह प्राकृतिक एवं असंयम आहार-विहार से बचा रहे । यह बचाव तभी संभव है जब विचार, स्वभाव एवं कार्यक्रम में सतोगुण की समुचित मात्रा हो । गायत्री उपासना के फलस्वरूप साधक में असंयम के लिए स्थान नहीं रहता, अतएव बीमारी और कमजोरी से भी उसे छुटकारा मिल जाता है । जो बीमारियाँ बहुत दिनों से शरीर में प्रवेश किए हुए थीं, बहुत दवा-दारू कराने पर भी ठीक नहीं हो रही थीं, वे गायत्री उपासना से अपने आप ठीक होती देखी हैं। असाध्य रोगी मृत्यु के मुँह में से वापस लौटते देखे गए हैं। साधना द्वारा शरीर में सतोगुण की वृद्धि करना एक ऐसी रामबाण औषधि है जिसके समान सारे चिकित्सा शास्त्र में अन्य कोई वस्तु नहीं मिल सकती ।