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अध्याय 5 / २४

परम पोषक वैष्णवी

Gayatri Mahatmya - Swawlamban

परमात्मा का रजोगुणी रूप विष्णु है, विष्णु की शक्ति को वैष्णवी कहते हैं। विष्णु का वाहन गरुड़ है। वैष्णवी भी गरुड़ पर आसीन हैं। गरुड़ रजोगुणी का प्रतिनिधि है। वैष्णवी इसी रजोगुणी से प्राणी को जीवन का रस पिलाकर उसे परिपुष्ट करती है ।

माता अपने बालक पर सब कुछ निछावर करती है। उसकी गोदी में पहुँचकर वह सब प्रकार से निश्चिंत और निर्भय हो जाता है । माता प्रिय से प्रिय वस्तु उसे देने में संकोच नहीं करती, परंतु ऐसा तभी होता है जब बालक सर्वतोभावेन अपने को माता के प्रति अर्पण कर देता है जब तक बालक पूर्णतया माता पर अवलंबित रहता है तब तक वह उसे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलती ।

जैसे-जैसे बालक अपना स्वार्थ पहचानने लगता है, वैसे-वैसे वह माता की उपेक्षा का पात्र बनता जाता है। देखा गया है कि जब वही बालक बड़ा हो जाता है तो माता के स्नेह को, वात्सल्य को भूल जाता है, उसके मन में कृतज्ञता एवं श्रद्धा-बिल्कुल नहीं रहती, स्वाभाविक एवं सच्ची शक्ति से वह कभी माता के चरणों पर अपना मस्तक नहीं नवाता है। हाँ जब कुछ मतलब निकलता होता है तो चिकनी-चुपड़ी बात बनाकर माता से अपना स्वार्थ सिद्ध करा लेने का जाल बिछाता है। अनेक साधक भी ऐसा ही करते हैं। उनमें आद्यशक्ति, जगज्जननी के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा-भक्ति का एक कण भी नहीं होता, पर जब कुछ काम अटकता है तो उसी सहायता के लिए नाना प्रकार से दंडौत करते हैं। माता घट-घट वासिनी है । वह सच्चे और झूठे निःस्वार्थ भक्त और चापलूसी का अंतर भली प्रकार जानती है । खुदगर्जी के सामने वह कभी-कभी एक टुकड़ा भी फेंक देती है कभी-कभी दुत्कार भी देती है। जो हो, ऐसे लोगों के प्रति उसके मन में सच्ची ममता कदापि उत्पन्न नहीं होती ।

सच्चा भक्त माता से वस्तुएँ नहीं माँगता उसका प्रेम माँगता है । अपना सर्वस्व माता को सौंप देता है और उसकी गोदी में नवजात शिशु की तरह निश्चिंत होकर विश्राम करता है। ऐसा भंक्त निश्चय ही अपने को अनंत शांति की गोद में अनुभव करता है। उसे माता का सच्चा प्रेम और संरक्षण प्राप्त होता है। सर्व शक्तिमान माता की गोद में किलोल करता है उसे कोई अभाव एवं कष्ट पीड़ित नहीं कर सकता । वैष्णवी रहता है ।


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