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आद्यशक्ति महामहिमामयी गायत्री के तीन रूप हैं-हीं, श्रीं, क्लीं । ह्रीं कहते हैं-सरस्वती को, श्रीं कहते हैं-लक्ष्मी को, क्लीं कहते हैं-काली को । सबसे प्रथम और सबसे प्रधान ह्रीं है। सरस्वती के रूप में साधक के मन में सद्बुद्धि रूपी वीणापाणि भगवती का प्रवेश होता है । हंस जैसा नीर-क्षीर विवेक करने वाली दूरदर्शिता, अंतःकरण को सदाशयता से झंकृत कर देने वाली झंकार, यह दो उपहार साधक को प्रारंभिक प्रसाद की तरह प्राप्त होते हैं ।
बुद्धि का शुद्ध होना और सद्बुद्धि प्राप्त होना यह दोनों उपहार माता अपने भक्त को देती हैं। बुद्धि में जो मलीनता, चंचलता, अस्वस्थता भरी रहती है उसके कारण मस्तिष्क निर्बल होता है और स्मरण शक्ति की कमी, तीक्ष्ण चेतना का अभाव, मोटी अक्ल देर से समझ आना, अधिक समय तक कोई बात याद न रहना, बौद्धिक बात करने में मस्तिष्क थक जाना आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं, जिनके कारण कई कार्य ऐसे हैं जिनमें सफलता का मार्ग रुक जाता है । इन दोषों के कारण विद्यार्थी फिसड्डी रहते हैं, परीक्षा में फेल हो जाते हैं । वकील, डाक्टर, वक्ता, लेखक, मुनीम, कारीगर अपने अपने कामों में अनेकों भूल करते हैं, जिससे उनकी कीर्ति और आजीविका दोनों में ही कमी आ जाती है अथवा विकास रुक जाता है ।
गायत्री बुद्धि का मंत्र है। उसमें 'ह्रीं' तत्व की उपासना प्रधान है। इस महामंत्र से बुद्धि की मलीनता दूर होती है और मस्तिष्क से काम करने वाले लोगों की सफलता का मार्ग खुल जाता है। गायत्री उपासना करने वाले विद्यार्थी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते हैं तथा अन्य बुद्धिजीवी लोगों की मनोदशा में सफलता आ जाने के कारण उनका कार्य उन्नति करता हुआ देखा गया है। मस्तिष्क में बल आने से अनेकों मानसिक रोगों को अपने आप अच्छा होते देखा गया है। सिर-दर्द, आधा-शीशी, पागलपन, भूतोन्माद, विक्षिप्तता, सनक, दुःस्वप्न, डर लगना, मृगी, मूर्छा आदि में गायत्री उपासना से आशाजनक लाभ होता है ।
सद्बुद्धि का संबंध सद्गुणों से है । व्यवस्थित कार्यक्रम सुलझे हुए विचार, स्थिर मति, दूरदर्शिता, प्रतिष्ठा, व्यवहार, शांत चित्त, संतुलित विवेक, सूक्ष्म समझ यह सब बातें सद्बुद्धि के कारण प्राप्त होती हैं । सद्बुद्धि और शुद्ध बुद्धि के प्रतीक सद्ग्रंथों की चित्त में वर्षा होती हुई दिखाई देती है। गायत्री उपासना के फलस्वरूप माता का यह उपहार उसके प्रिय बालकों को अवश्य प्राप्त होता है ।